मीत भाइ शृंखलाक मैथिली भाषा कथा-व्यंग्य:२/२. (गजेन्द्र ठाकुर) - मिथिला दैनिक

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मंगलवार, 29 जुलाई 2008

मीत भाइ शृंखलाक मैथिली भाषा कथा-व्यंग्य:२/२. (गजेन्द्र ठाकुर)



पसीझक काँट भाग - २ मीत भाइक विवाह

ई विशुद्ध व्यंग्य-रचना थिक। एहिमे वर्णित कोनो घटना-दुर्घटनाक वर्णन ककरो आहत करबाक लेल नहि वरन् विशुद्ध मनोरंजनक लेल कएल गेल अछि।
















मीत भाइक चरचा सौँसे परोपट्टामे पसरि गेल छल। सुनामे नाम आकि कुनामे नाम।

से घटक सभ हिनका चन्सगर बालकक रूपमे विख्यात कए देलकन्हि। आब मीत भाइक बगेबानीक चरचा करब। लिकलिक करैत भूत सन कारी रंग, कतेक कारी से ओहि खापड़िकेँ देखि लिअ ततेक। आकि घड़ीक करिया चमड़ाक बेल्ट देखि लिअ ओतेक। पकिया कारी रंग छलन्हि मीत भाइक। जनाना लोकनि चरचा करैत छलीह जे भगवानोकेँ एतेक कारी रंगक माटि कतएसँ भेटलन्हि। मुदा घटक लोकनि हुनका कारी टुहटुह कहैत छलाह। जखन लोक कहन्हि जे औ घटकराज, लाल टुहटुह होइत छैक, कारी-खटखट कहल जाइत छैक, कारी टुहटुह नहि। मुदा घटक लोकनि मीत भाइक मुँह परक पानिक चरचा करैत छलाह।

मुदा घटक लोकनिक चन्सगर बालकक रूपमे हुनकर वर्णनक अछैत एकोटा घटक नहि आयल। से लालकका दिल्लीसँ फोन कए एकटा लड़की बलाकेँ पठेलन्हि आऽ तखन जाऽ कए पहिले शरबतमे मीत भाइक विवाह ठीक भे गेलन्हि। घटककेँ आऽ संगमे दलान पर जुटल लोकसभकेँ शरबत घोरि कए पिएबाक प्रथा छैक से तँ बुझले होएत।

बेश, तखन मीत भाइक विवाह भऽ गेलन्हि। जखन एक मास पर मोटा-सोटा कए घुरलाह मीत भाइ तँ जगन्नाथ भाइ रस्तेमे भेटि गेलखिन्ह।

“भाइ, कनिया केहन छथि, पसिन्न पड़लथि ने”।

“हँ, हँ जगन्नाथ भाइ। बड़ सुन्दर छथि। हेमामालिनीकेँ देखने छियन्हि? एन-मेन ओहने। मुदा रंग कनेक हमरासँ डीप छन्हि”।

जगन्नाथ भाइ अवाके रहि गेलाह।

किछु दिनुका बाद एक दिन मीत भाए भोरे-भोर पोखड़ि दिशि जाइत रहथि तँ जगन्नाथ भेटलखिन्ह, गोबड़ काढ़ि रहल छलाह बेचारे। कहलखिन्ह,

“यौ मीत भाइ, हमरे जेकाँ अहूँ सभकेँ भोरे-भोर गोबड़ काढ़य पड़ैत अछि ?”

मीत भाइ देखलन्हि जे हुनकर-जगन्नाथ भाइक- कनिञा सेहो बगलमे ठाढ़ि छलखिन्ह। से एखन किछु कहबन्हि तँ लाज होएतन्हि। से बिनु किछु कहने आगू बढ़ि गेलाह। जखन घुरलाह तँ एकान्त पाबि जगन्नाथकेँ पुछलखिन्ह-,

“भाइ, पहिने बियाहमे पाइ देबय पड़ैत छलैक, से अहाँकेँ सेहो लागल होयत। ताहि द्वारे ने उमरिगरमे बियाह भेल”।

”हँ से तँ पाइ लागले छल”।

“मुदा हमरा सभकेँ पाइ नहि देबय पड़ल छल आऽ ताहि द्वारे गोबरो नहि काढ़य पड़ैत अछि, कारण कनियाँ ओतेक दुलारू नहि अछि”।

एक बेर बच्चा बाबूक ओहिठाम गेलाह मीत भाइ। ओऽ पैघ लोक आऽ तेँ बड्ड कँजूस। पहिने तँ सर्दमे गुरसँ होएबला लाभक चर्च कएलन्हि, जे ई ठेही हँटबैत अछि आऽ फेर गूरक चाह पीबाक आग्रह।मुदा मीत भाए कहि देलखिन्ह जे गुरक चाह तँ हुनको बड्ड नीक लगैत छन्हि। मुदा परुकाँ जे पुरी जगन्नाथजी गेल छलाह, से कोनो एकटा फल छोड़बाक छलन्हि से कुसियार छोड़ि देलन्ह। आऽ कुसियारेसँ तँ गुर बनैत छैक। ओहि समयमे चुकन्दरक पातर रसियन चीनी अबैत छल, से बच्चा बाबूकेँ तकर चाह पिआबय पड़लन्हि।किछु दिन पहिने बच्चा बाबू एहि गपक चर्च कएने छलाह जे ओऽ जोमनी छोड़्ने छलाह तीर्थस्थानमे आऽ तैँ जोम खाइत छलाह। हरजे की एहिमे। एकर मीत भाइ खूब नीक जबाब देलन्हि एहि बेर। अधिक फलम् डूबाडूबी।

अपने लोकनि मीत भाइक बुधियारी किंवा कबिलपनीक चरचा सुनलहुँ। मुदा मीत भाइक ई सरल जीवन बियाहक बाद, वा कहू बेटाक पैघ भेलाक बाद कनेक कालक लेल हिलकोर लेलकन्हि। भेल ई जे मीत भाइक बेटा भागि गेलन्हि।मीत भाइक बेटा भागि गेलन्हि, आऽ ई क्यो पुछन्हि तँ पुछला पर मीत भाइक कोढ़ फाटि जाइत छलन्हि।

“यौ,लोक सभ यौ लोक सभ। लाल काका बियाह तँ कराऽ देलन्हि, मुदा तखन ई कहाँ कहलन्हि जे बियाहक बाद बेटो होइत छैक”।

आब मीत भाइ बेटाकेँ ताकए लेल आऽ बेटाक नहि भेटला उत्तर अपना लेल नोकरी तकबाक हेतु दिल्लीक रस्ता धेलन्हि।दिल्लीक रस्तामे मीत भाइक संग की भेलन्हि हुनकर बुधियारी आकि कबिलपनी काज अएलन्हि वा नहि, एहि लेल कनेक धैर्य राखए पड़त। कारण ट्रेनक सवारी अछि आऽ बजनहार उत्साहित छथि मुदा सुननहार थाकल बुझि पड़ैत छथि।