गीत





नवल गीत हम लीखि रहल छी
नव लय ओ नव तालमे
नव नव हम गीत सुनायब
नव स्वर नव भासमे

जहिना गुजरए जिगनी सदिखन
जन्म जरा ओ मृत्युसँ
परंपरा गुजए तहिना
आदि मध्य ओ अंतसँ
भेल पुरान गीत पहिलुका
नै रोचै अचि समाजकेँ

अछि आवश्यकता नव गीतक
नव प्रीतक पहिचान लेल
अछि आवश्यकता नव भासक
नव स्वरक उत्थान लेल
ल' गर्भमे हम आबि रहल छी
नव सृष्टिक नव अंशकेँ.................


सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ