गजल

देख   मुह  मूंगबा बहुतो बटाई छै 
नाम ककरो गरीबक नहि सुहाई छै 

चाहि निर्धन कए नहि योगरा बाबा 
पेट भरि जाइ सब दीनक दबाई छै 

मीठ भाषण बरख पाँचे  कते दै   छै 
जीत केँ बाद नेतो सब नुकाई छै 

घूस खा 'खा ' क ' बनलै भोकना पारा
आन दमड़ी सँ चमड़ी बड चबाई छै 

भ्रष्ट नेता घुमे बीएमडब्लू  में 
एखनो हक गरीबक 'मनु' बटाई छै 

(२१२२  १२२२ १२२२, बहरे-मुशाकिल ) 
जगदानन्द झा 'मनु'   : गजल संख्या - ५७ 

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