गजल - जगदानन्द झा ‘मनु’


अहाँ पिआर करु हमरा हमर बसन्ती पिया
अपन बाबूक नहि हम  आब रहलहुँ  धिया

बहुत जतनसँ  सोलह बसन्त सम्हारलहुँ
आब नहि सहल जाइए हमर टूटेए  हिया

नेह रखने छी नुका कए कोंढ़ तर अहाँ लए
रुकि नहि जुलूम करु हमर तरसेए जिया

आब आँकुर फूटल पिआरक अछि चारू दिस
अहाँ जे रोपलौं  करेजामे हमर प्रेमक बिया

आउ हमरा सम्हाइर लिअ हमर सिनेहिया
अहाँकेँ सप्पत दै छी करियौ नै ‘मनु’ एना छिया

(सरल वार्णिक बहर,  वर्ण-१८)
जगदानन्द झा ‘मनु’

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