गजल - भास्कर झा


किछु लोक किछुके हरकाबए पर लागल छै
विरोधक आईग में झरकाबए पर लागल छै।

जिनका जे नीक लागय सब बड्ड नीक करैया
जाति-पातिक नामसं भरकाबए पर लागल छै।

नवतुरियाक उमंग देखि मिथिला-मन गवैया
एहन सुन्नर तानके कनाबय पर लागल छै।

गीत-गजलक छंद मुक्तक हायकू काव्यक अंग
सर्जन सुन्नर बारीघर खसाबए पर लागल छै।

अलभ्य लाभके लोभमें पड़ल करय आगू पाछू
भेटल जीनगीके अहिना सड़ाबए पर लागल छै।

------------------भास्कर झा 6 अगस्त 2012

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2 टिप्पणियाँ

  1. sabase pahile ta ham abhar byakt kair rahal 6i ee webside open kail je tekara. apan mithila apan maithali sanskriti ke dhani 6ait, muda akhan ohe dharasayi me paral 6ait tya ehike bachabak chahi hamani ke.jay maithli jay mithila.

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  2. dhanbad muda dahej aur apan sanskriti ke jada badhaba debak chahi.

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