मिथिलांचलक लेल अप्पन मातृभाषा 'मैथिलीक' महत्त्व - मिथिला दैनिक

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शनिवार, 6 जनवरी 2018

मिथिलांचलक लेल अप्पन मातृभाषा 'मैथिलीक' महत्त्व

सम्पादकीय। 06 जनवरी। [जितमोहन झा (जितू)] जीवन मे अप्पन मातृभाषा केर महत्व सर्वविदित अछि, मुदा मातृभाषा केर महत्व केँ मिथिलांचलवासी अनदेखी कऽ रहल छथि। आई काल्हि मौलिकता पता नहि कतय हरा गेल अछि। मौलिकता अयबो करत तऽ कोना? ई सर्वविदित तथ्य अछि जे किओ गोटे दू पाँति अप्पन सहज मातृभाषा मे बाजियो नहि सकैत छथि।

साहित्यिक रचनात्मकता सेहो आई काल्हि विलुप्तताक कगार पर अछि। घर आओर परिवार सेहो पहिनेक अपेक्षा बेसी टूइट रहल अछि। बूझी वा नहि, मुदा, एहि दुर्वस्थाक कारण हमरा सभक अप्पन मातृभाषा सँ दूर होयब अछि। प्रत्येक भाषा, मानव सभ्यता आओर ओकर इतिहासक प्रतिफल होयत अछि। मातृभाषाक सबसे पैघ काज होइछ जे ई हमरा सभकेँ अप्पन जड़ि, अप्पन माटि-पानि सँ जोड़ने रखैत अछि।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र अप्पन प्रसिद्ध कविता ‘मातृभाषा के प्रति’ मे किछु एहि तरहक महत्ता दर्शेने छथि---

“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
 बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
 विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
 सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।”

यदि हम सभ आन राज्य जेना महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, बंगाल, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु,केरल आदि सभक अध्ययन करी तऽ देखब कि आधुनिकताक एहि अन्हरायल भागमभागहु मे ई राज्य सब अप्पन क्षेत्रीय भाषा केँ संरक्षण प्रदान करैत विकास मे अगुआयल अछि। हम सभ देखि सकैत छी जे, जे राज्य अप्पन क्षेत्रीय भाषाक पूरा ध्यान रखलक ओ सभ राज्य विकास मे सेहो बहुत आगू अछि। कहक  तात्पर्य अछि जे विकासक लेल क्षेत्रीय भाषा सभक अनदेखी कदापि नहि होयबाक चाही। ओ विकास मे बाधक नहि अपितु, साधक अछि, से मानय पड़त।

क्षेत्रीय भाषा आन दृष्टिये सेहो महत्वपूर्ण अछि। हमरा सभक पूर्वज द्वारा अर्जित ज्ञान हमरा सभकेँ अप्पन क्षेत्रीय भाषहि मे प्रदान कएल गेल अछि। जीवनक कतेको गुर हम सभ लोकोक्ति आओर लोकगीतक माध्यम सँ सिखैत छी। वैज्ञानिक  रूपें ई तथ्य स्थापित भऽ चुकल अछि जे मनुष्यक सर्वश्रेष्ठ विकास तखनहि संभव होइत छैक जखन ओकर प्राथमिक शिक्षा ओकर मातृभाषा मे देल जाइत अछि। एहेन स्थिति मे क्षेत्रीय भाषा केर अनदेखी करब ज्ञान सँ मुँह फेरब सिद्ध होयत। ई प्रवृत्ति आत्मघाती सिद्ध होयत ताहि मे कोनो संशय नहि। 

आजुक भौतिकतावादी समाज क्षेत्रीय भाषा केँ नकारि देने अछि। यदि हम सभ समय अछैत नहि सम्हरब तेँ ओ दिन दूर नहि जहिया आबय बला पीढ़ी अप्पन सभ्यता तक केँ बिसरि चुकल होयत आओर हुनका सभ लग अप्पन कहबाक लेल किछु शेष नहि रहत। एहेन विकट परिस्थिति मे जँऽ किछु मातृभाषा प्रेमी लोकनि अपन भाषा आओर लिपिक संवर्द्धन आओर संरक्षण मे अहर्निश लागल छथि तऽ हुनक एहि भगिरथ प्रयास केँ जतेक प्रशंसा कएल जाय से कम। एहि मे लागल अधिकांश व्यक्ति अप्रवासी मैथिल छथि जे अपन जीविकोपार्जनक संग-संग मिथिला-मैथिली लेल तन-मन-धन सँ जुड़ल छथि। 

कतेको अभियान चलि रहल अछि अपन मातृलिपिक  जागरूकता लेल जाहि मे प्रमुख अछि "मिथिलाक्षर शिक्षा अभियान" एवं "मिथिलाक्षर साक्षरता अभियान"। एहि अभियानक उत्साहवर्धक परिणाम सेहो दृष्टिगोचर भऽ रहल अछि जे शुभ लक्षण थिक। एकर अलावे एकटा अभियान आओर जोर शोर सँ चलि रहल अछि जकर नाम अछि "मैथिली क्रांति - मिथिला विकास संगठन" जकर उद्देश्य अछि मैथिली शिक्षकक बहाली। आशा अछि जे ई अभियान अपन लक्ष्य केँ अवश्य पूर्ण करत। हमरा सबहक शुभकामना एहि अभियान सभक प्रति सदिखन रहत ताहि मे कोनो संशय नहि। कहक मतलब ई कखनहु नहि अछि जे मात्र अपन मातृभाषहि पर ध्यान दी। ज्ञानार्जन सँ नीक बात किछु आओर भइयो नहि सकैछ। जतेक भाषाक ज्ञान होयत जीवन मे ओतेक आगू बढ़बाक अवसर भेटैत छैक। मुदा, अपन मातृभाषाक उपेक्षा कऽ के तऽ कखनहु नहि। कहबियो छैक - घर दही तऽ बाहरो दही।