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दिल्ली। 23 अक्टूबर। प्रकृति-पूजोपासना केर महापर्व छठ मिथिला समेत सगर बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश आओर झारखंड म' मनाओल जाय बला एक लोक-आस्था केर पर्व अछि, मुदा एहि पर्व क' मनेबाक पाछू जे तथ्य अछि, ओ विश्वव्यापी अछि। इए कारण अछि कि प्रवासी पूर्वाचलिय सभक एहि पर्वक प्रति लोग सभमे आस्था आय नहि सिर्फ देशक आन भूभाग सभमे बल्कि विदेश सभमे सेहो देखल जायत अछि।

दरअसल, छठ पर्यावरण संरक्षण, रोग-निवारण व अनुशासन केर पर्व अछि आओर ऐहिक उल्लेख आदिग्रंथ ऋग्वेद म' कायल गेल अछि।

दिवाली पर लोग सभ अप्पन घरक सफाई करैत छथि, त' छठ पूजा पर नदी-तालाब, पोखैर आदि जलाशय सभक सफाई करैत छथि। जलाशय सभक सफाई करबाक ई परंपरा मगध, मिथिला आओर ओहिक आसपास के क्षेत्र सभमे प्राचीन काल सँ चलैत आएब रहल अछि। दीवाली के अगले दिन स' लोग सभ एहि काज म' भीड़ जैत छथि, किएक जे बरसातक बाद जलाशय आओर ओहिक आसपास कीड़ा - मकोड़ा सभ अप्पन डेरा जमा लैत अछि, जाहिक कारण बहुत बिमारी पसरैत अछि। 

एहि तरहे छठ जलाशय सभक सफाई के सेहो पर्व अछि। आय सरकार द्वारा चलाओल जे रहल "स्वच्छ भारत अभियान" आओर "नमामि गंगे" योजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मनपसंद परियोजना मानल जायत अछि। पछिला तीन बरख स' मोदी सरकार स्वच्छता अभियान आओर गंगा केर सफाई लेल बड़का मुहिम चला रहल अछि। एहि दुनू अभियानक  लोक-आस्था केर पर्व छठ पूजा सँ सैद्धांतिक व व्यावहारिक ताल्लुकात अछि।

सैद्धांतिक रूप स' मोदी सरकार के गंगा सफाई योजना के जे मकसद अछि, ओहिके बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश आओर झारखंड म' लोग सभ सदियों सँ बुझैत छथि आओर छठ पूजा स' पहिने जलाशय सभक सफाई करैत छथि।

व्यावहारिक पक्ष केर बात करि त' प्रधानमंत्री जाहि स्वच्छ भारत केर परिकल्पना केना छथि, ओ जनभागीदारी केर बिना संभव नहि अछि। नीति व नियम स' कोनो अभियान म' लोग सभके जोड़ब ओतेक आसान नहि अछि, जतेक कि आस्था व श्रद्धा सँ संभव अछि। खास करिके जाहि देश म' धर्म लोग सभक जीवनक-पद्धति होय, ओता धार्मिक विश्वास केर विशेष महत्व होयत अछि। 

छठ पूजा म' सूर्य केर उपासना कायल जायत अछि। संगहि, कठिन व्रत व नियम सभक पालन सेहो कायल जायत अछि। एहि तरहे ई प्रकृति पूजा केर संगे - संग शारीरिक, मानसिक आओर लोकाचार म' अनुशासन केर सेहो पर्व अछि। कार्तिक शुल्क पक्ष के षष्ठी व सप्तमी क' दू दिन मनाओल जाय बला एहि पाबनिक लेल व्रती महिला चतुर्थी तिथि सँ शुद्धि केर विशेष नियम केर पालन करैत छथि। पंचमी क' खरना व षष्ठी क' सांध्यअघ्र्य आओर सप्तमी क' प्रात:अघ्र्य द' पूजोपासना केर समापन होयत अछि। 

छठ पूजा म' व्रती सभके डाँर भरी पैन म' ठाढ़ भ' सूर्य देवता केर ध्यान करबाक प्रथा अछि। जल-चिकित्सा म' ऐहिके 'कटिस्नान' कहल जायत अछि। एहिसँ शरीरक कैको रोग व्याधि केर निवारण होयत अछि। नदी-तालाब व आन जलाशय सभक पैन म' देर धरी ठाढ़ रहबा सँ कुष्टरोग समेत कैको चर्मरोग सभक एहो उपचार होयत अछि।

हम सभ जानैत छी कि धरती पर वनस्पति व जीव-जंतु सभके सूर्ये सँ ऊर्जा भेटैत अछि। सूर्यक किरण सँ विटामिन-डी भेटैत अछि। पश्चिम के देश सभमे लोग सभके सूर्यक रोशनी पर्याप्त नहि भेटला सँ हुनका सभक शरीर म' विटामिन-डी केर कमी पाओल जायत अछि आओर हुनका सभके एहि विटामिन के कमी स' होमै बला रोग सभक खतरा बनल रहैत अछि। एहिलेल रोग स' बचबाक लेल ओ सभ दबाई केर सेवन करि विटामिन-डी के अप्पन जरूरत पूरा करैत छथि। 

अप्पन देशक अक्षांशीय स्थिति एहेन अछि कि देश के हर भूभाग म' सूर्य के भरपूर प्रकाश भेटैत अछि। सूर्य क' एहिलेल सेहो रोगनाशक कहल जायत अछि, कीएकजे सूर्य केर किरण जाहि घर म' सीधी पहुँचैत अछि, ओहि घर म' कीड़ा - मकोड़ा सभक वास नहि होयत अछि। इए कारण अच्छी कि लोग सभ पूर्वाभिमुख घर बनेनाय पसंद करैत छथि।

छठ पूजा ठंढी केर शुरुआत स' पहिने मनाओल जायत अछि। जाहिर अछि, ठंढी म' सूर्योष्मा केर महत्व बैढ़ जायत अछि। ऐहिक लेल सूर्य केर  उपासना करि लोग हुनका सँ शीत ऋतु म' ठंड सँ बचेबाक नेहोरा करैत छथि। ओतहि, ई जल संरक्षण केर सेहो पर्व अछि।

प्रकृति पूजा हिंदू धर्म केर संस्कृति अछि। एहेन परंपरा रहल अछि कि जाहि जीव सँ वा जीवेतर वस्तु सँ हम उपकृत होयत छी, ओहिके प्रति अप्पन आभार व्यक्त करैत छी। ऐहिक लेल हमरा सभक ओइठाम नदी, तालाब, कुआं, वृक्ष आदि सभक पूजा केर परंपरा अछि। ऋग्वेद म' सेहो सूर्य, नदी आओर पृथ्वी क' देवी-देवता सभक श्रेणी म' राखल गेल अछि। 
हिंदू धर्म अपना आप म' एक दर्शन अछि, जे हमरा सभके जीवन-शैली व जियब सिखबैत अछि। छठ आस्था के महापर्व होयबाक संगे - संग जीवन-पद्धति के सीख देबै बला त्योहार अछि, जाहिमे साफ-सफाई, शुद्धि व पवित्रता केर विशेष महत्व होयत अछि। ऐहिक लेल हमर मानब अछि कि लोक-आस्था के एहि महापर्व क' स्वच्छता केर राष्ट्रीय त्योहार घोषित कायल जेबाक चाही। 

संगहि, ऊर्जा संरक्षण, जल संरक्षण, रोग-निवारण व अनुशासन के एहि  पर्व क' पूरा भारत म' मनाओल जेबाक चाही। एहिसँ जनकल्याण के काजक प्रति लोग सभ दिलचस्पी बढ़त आओर स्वच्छ भारत के  परिकल्पना क' साकार करबा म' मदैद भेटत।

छठ क' राष्ट्रीय पर्व घोषित केला सँ देशक कोन - कोन म' पसरल जलाशय सभक सफाई के प्रति लोग सभमे जागरूकता आओत आओर एहिसँ जल - संरक्षण अभियान क' सेहो गति भेटत। लोक-आस्था के एहि पर्वक महत्व क' स्वीकार करैत दिल्ली सरकार द्वारा अप्पन बजट म' छठ-पूजा के लेल  विशेष व्यवस्था कायल गेल अछि। 

दिल्ली सरकार दिस स' छठ-पूजा के लेल करीब 600 घाट व पूजा-स्थल सभक व्यवस्था कायल गेल अछि। ओनाकि ऐहिक राजनीतिक मायना सेहो निकलैत अछि, किएक जे दिल्ली विधानसभा के 70 सीट म' करीब 50 सीट एहेन अछि, जता पूर्वाचलिय सभक उपेक्षा करि कैको राजनीतिक दल दिल्ली केर सत्ता पर काबिज नहि भ' सकैत छथि। 

भलही पूर्वाचलिय सभक भावना केर सम्मान करबाक बात होय, मुदा छठ पूजा ल'क' राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के निवासि सभमे जाहि प्रकारक आस्था देखल जे रहल अछि, ओ पर्यावरण संरक्षण केर प्रति जागरूकता केर  द्योतक अछि। लिहाजा, भारत सरकार क' ऐहिके अप्पन संज्ञान म' लेबाक चाही।

दिल्ली के अलावा, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद समेत देशक विभिन्न महानगर सभमे पूर्वाचली प्रवासी धूमधाम सँ छठ मनबैत छथि। एतबे नहि, मॉरीशस, फिजी व अमेरिका समेत कैको देश सभमे सेहो पूर्वाचली भारतीय प्रवासी छठ मनबैत छथि, जाहिके देखैत विदेशी लोग सभ म' एहि पर्वक प्रति आकर्षण बढ़ल अछि।

हालक दिन सभमे  'राइट टू ब्रीथ' केर तहत सर्वोच्च न्यायालय दिस स' दिल्ली म' प्रदूषण के स्तर कम करबाक लेल कैको डेग उठाओल गेल अछि। जेना मैन्युफैक्चरिंग युनिट्स सभके दिल्ली स' बाहर कायल गेल अछि। दिल्ली म' ईंट-भट्ठा लगेबा पर रोक अछि। एहि बरख दीवाली पर पटाखा सभक बिक्री पर रोक लगाओल गेल। 

ई सभ रोक लगेबा बला बात भेल, मुदा प्रकृति पूजोपासना के पर्व छठ क' पर्यावरण संरक्षण सँ जोड़ैत यदि केंद्र व राज्य सरकार सभक दिस स' आओर श्रद्धालु सभक मदैद स' देशक विकास म' एहि पर्व के योगदान सुनिश्चित करब एक सकारात्मक पहल होयत।

हर बरखक भांति एहि बरख सेहो दिल्ली-एनसीआर म' पूर्वाचली लोक आस्था केर पर्व छठ धूमधाम सँ मनेबाक लेल तैयारि शुरू क' देना छथि। राजनीतिक दल सभक नेता व जनसेवक सभक शुभकामना केर तख्ति सभ गली-चौराहा पर टांगल जे चुकल अछि। जाहिर अछि, एहि दिलचस्पी केर पाछू वोट बैंक केर राजनीति एकमात्र मकसद अछि। मुदा पर्यावरण केर मुद्दा क' ध्यान म' राखैत अगर छठ पूजा केर महत्व क' देखल जाय, त' मकसद व्यापक होयत आओर एहिमे आम लोग सभक दिलचस्पी व भागीदारी बढ़त।

(एहि आलेख के लेखक "डॉ. बीरबल झा" प्रख्यात शिक्षाविद् व मिथिलालोक फाउंडेशन के अध्यक्ष छथि)

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