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आई पवन वेग में चली रहल,
नव अंकुर मन में पली रहल!
अछि फ़ूकबा के गुंजाइस नै,
आब उड़बा के फरमाईस नै!
पलव्वित करी एही अंकुर के,
माया छोरी क्षण भंगुर के!
कलकल प्रेमक निरवता सँ
मन चंचल वेग समीरता सँ
सिंचन करी एही विटपता के
चित साधु संत सहजता के
एक दिवस महा वट वृक्ष बनै
ता पर नाना मधु पुष्प खिलै
प्रेमक पाश में बाँधि अपन
मधु के ललसा में भय मगन
दुश्टो सब अपन सुइध हेरय
भंवरा बनि अपने पंख चिरय
द छाया अपना आँचल के
एही माया मृग सँ बाँचल जे
निस्वार्थ भाव् नीर बहैत रहा
जग्भर्मित पथगामी पिबैत रहैए
मधु सन माधुर्य सुधामय जग
लय सुख - दुःख के मेथैत रहैए
जीवन संझा आब ढैल रहल
अंकुर के बीज फेर पनैप रहल!
आई पवन वेग में चली रहल, !!
(नविन ठाकुर)

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