2
नहि-नहि पहिल बेर नहि कहु, रहय तऽ शायद १२म वा १३म मुदा भाँग खेने रही पहिल बेर!! हर हर!! हम आ श्यामजी अशर्फियाके दोकानपर जायके भंगपेड़ा किनलहुँ, मास्टरसाहेबके भतिजा बिजय सेहो आबि गेल आ एवम्‌ प्रकारेन्‌ तीनू गोटे एकेगो पेड़ामें कने-कनेटाके तोड़िके डरैते-डरैते खा लेलहुँ - स्वाद तऽ खुवा द्वारे मीठे बुझैल मुदा भाँगके लटपटी खैते काल बुझा गेल जे अवश्य कोनो बखेड़ा ठाड़्ह करत। खैर आब तऽ मुँहमें सँ भीतर पेटमें उतारि देलियैक ओकरा आ फेर बिसरा गेल जे कि केलहुँ। रंग-अबीर खेल शुरु भेल - सभ संगीके ताकि-ताकि रंग लगयलहुँ एवं लगवयलहुँ। खूब आनन्द आबि रहल छल। आखिर एक वर्षके बाद आयल छल ओ दिन आ फेर एक वर्षके बादे आयत ओ दिन! कोना चूकी - जेहो सभ नहि करबाक चाही सेहो सभ करयके मोंन करैत रहल। कखनहु दोगीमें ठाड़्ह रास्तापर चलयवालापर रंग उड़ा दैत छलहुँ तऽ कखनहु अंगनामें काज करवालीके देह पर भरि बाल्टीन रंग छिंट दैत छलहुँ। ताहि समय में बहुत परिपक्व ज्ञान तऽ नहि छल मुदा भौजीके ज्ञान छल - किऐक तऽ भौजी सभक ज्ञाने सऽ हमरो धिया-पुता दियर सभके एतबा ज्ञान छल जे भौजी गैरपढुवा वर्गमें पड़ैत छथि। हुनका संगे केहनो मजाक कऽ लियऽ, चलतै! :) लेकिन हिम्मत नहि छल जे भौजी सभके असगरे रंग लगा सकी... बड़ जबरदस्त छलीह हुनका लोकनि। केओ एगो धिया-पुता दियर यदि पकड़ा गेल तऽ ओकरा ओ सभ रंगहिसँ माजि दैत छलखिन। लेकिन धिया-पुता में सेहो नंगट‍इके कोनो कमी नहि रहय हमरो लोकनिमें। पहिले एकजूट भऽ के किछु गोटे मिलके अंगने-अंगने आक्रमण करैत छलहुँ। कम से कम १०-११ गो भौजीके दुलरुवा दियर होयबाक सौभाग्य प्राप्त छल। खूब मजा आबि रहल छल एहि बेरका होलीमें... पता नहि कोना!

‘एतेक मजा तऽ कहियो नै आयल छल रौ श्यामजी!!’

‘से गप तु ठीके कहै छँ... हमरो अहि बेर किछु अलगे बुझैछ।’

‘ऐँ रौ! कहीं भाँग तऽ नहि लागि गेल??’

‘धू बूड़ि! एक रत्तीके भाँग कतौ लागि सकैछ।’

मजाकमें उड़ा देलक गप श्यामजी!! मुदा कनिकबा कालमें जखन रानी टोलपर जा के भौजी सभके रंग लगाबय विदाह भेलहुँ आ कि पोखरी महाड़पर अचानक रस्ते संकीर्ण बुझाय लागल। फेर अतिश्योक्तिसंग श्यामजी के डंटैत कहलियै...

‘रे श्यामा! रस्ता छै जे अहि दऽ के जेबही?’

‘रौ किशोरबा! लगै यऽ जे तोरा सहीमें भाँग लागि गेलौक? रे बूड़ि! देखैत नहि छहि कन्छड़िये-कन्छड़िये रास्ता छै कि नै?’

‘लेकिन खधाड़ि जे छै, ताहिमें पैर पड़त खसब कि नै?’

‘ए!! आब बुझलियै... सारके भाँग एकरा ऊपर चढि गेलैक। हा..हा...हा...!!’

श्यामजी जोर सऽ हँसय लागल - तखन हमरो दिमागमें आयल कि कहीं सहीमें तऽ भाँग नहि लागि गेल! :) आब ओम्हर श्यामजीके हँसी रुकिये नहि रहल छलैक ओ बेर-बेर हमरा ऊपर ओंगरी उठबय आ फेर ताली पीटैत कहय जे एकरा लागि गेलै... एकरा लागि गेलै! हौ बाबु!! हम देखलियै जे ओकरो लागि गेलैक... तखन नऽ हँसी नहि रुकि रहल छलैक आ एके गो गप बेर-बेर बजैत छल। :) आब हमरो हँसी लागय लागल केवल एतबी सोचि कऽ जे ओकरो भाँग लागि गेलैक। हा...हा...हा!! आब हमरा दुनू गोटेके भाँग चढि गेल छल...!

ओम्हर बिज‍इया के कि भेलैक...? हम दुनू गोटे एहि बातके पता लगाबय मास्टरसाहेबके दलान लग हटियाके मैदानमें जाय लगलहुँ... मुदा मोंने मन मास्टरसाहेबके डर सेहो होय जे कहीं ओ बुझता तँ कल्याण नहि अछि। पीटाइ आइ नहि तऽ ट्युशन-कक्षामें तऽ पक्केटा होयत। तैयो एम्हर भाँगके जोर छल जे नहि जे हैत से हैत, मुदा चल देखियै बिज‍इया कोना अछि? हौ बाबु!! बिजय तऽ गुँह गिजि रहल छल...!!  बेर-बेर बजैत छल - बुरा न मानो होली है... बुरा न मानो होली है... आ हटियाके मैदानमें जेम्हर लोक नदी फिरैत छल ओतहि घिसियौर काटि रहल छल। रे बिजय! इ कि!! फेर कहय - बुरा न मानो होली है! बुरा न मानो होली है!! ततबामें मास्टरसाहेब सेहो देखेलाह... बेहोशियोमें हम आ श्यामजी पड़ेलहुँ आ मन्दिरमें जा के नुकयलहुँ। एम्हर बिजयके ओ हालत देखि हुनका सभटा गप बुझा गेलन्हि। तुरन्त ओकरा गट्टा पकड़िके टाटमें सँ करची घीचि ओकर देह-हाथ फोरैत ओकरा पोखरिमें हुला खूब डूबकी लगबाके बाहर घर लय गेलाह। आब हम आ श्यामा डर सँ सूटकल ओहि मन्दिरमें शांझ तक भूखल-प्यासल बैसल रहलहुँ... केवल माइरिक डरे!!

है रे हमर पहिलुक होली!! भाँगवाला होली!! मुदा आइ आब वैह समय मोंन पड़ैछ जे जानि कतय गेल ओ बचपन!! बचपनके हर चीज निराला, किया न हो चाहे भाँगके प्याला!!

होलीके असीम शुभकामना सहित,

प्रवीण चौधरी ‘किशोर’
कुर्सों, दरभंगा, बिहार!

मिथिला दैनिक क' समाचार ईमेल द्वारा प्राप्त करि :

Delivered by Mithila Dainik

मिथिला दैनिक (पहिने मैथिल आर मिथिला) टीमकेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, पाठक लोकनि एहि जालवृत्तकेँ मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय आ सर्वग्राह्य जालवृत्तक स्थान पर बैसेने अछि। अहाँ अपन सुझाव संगहि एहि जालवृत्त पर प्रकाशित करबाक लेल अपन रचना ई-पत्र द्वारा mithiladainik@gmail.com पर सेहो पठा सकैत छी।

 
#zbwid-2f8a1035