हम साँच बजैत छी ...डॉ. शेफालिका वर्मा - मिथिला दैनिक

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मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

हम साँच बजैत छी ...डॉ. शेफालिका वर्मा

हुजूर !
हम साँच साँच बजैत छी
साँच छोड़ी किछ नहि बजैत छी
हम दहेज़ नहि लैत छी .
राति दिन समाज सुधार में व्यस्त
रहैत छी
खाइत छी, पिवैत छी
मस्त रहैत छी
हुजूर ,हम दहेज़ नहि लैत छी.
की बाजलों
बड़का बौआ क व्याह में ?
नै नै जी नै
गलत बुझल अछ अहांके
स्थिति जानल नहि अहांके
टी वी देख बिन चैन नहि
फ्रिज क पानि बिन चैन नहि
से जज साहब !
अपन बेटी के ओ देलन्हि
हुजूर, हम ते नहि लेलहुं
हमरा सन गरीब ओते फ्रिज कत
टी वी कत
बस एकटा बेटा अछि
आला आफिसर
की कहलों गहना जेवर ?
ठीक बाजलों हुजूर
गहना से लादि देलक बाप ओकर
बाजल
अहाँ किछ नहि बाजु
रंग में भंग नहि घोरु
ई स्त्री-धन थीक
हमर बेटीक जीवन थीक
जखन सासुर में दुःख भेटत
जेवर जात स सुख भेटत
सोनाक खान में रहत
चैन क निन्न सूतत
हुजूर हमर की दोष अछि
की बेटी वाला निर्दोष अछि ?
की बाजलों ,छोटका बौआ ?
बेरोजगार ,निर्धन अछ
बस एकटा नौकरीक प्रश्न अछ ...
कोनो कोलेज में डोनेशन द
प्रोफेसरी दिआय दिय
आ की लाख लाख टका दय
सरकारी नौकरी लगाय दिय
बांचल अपन सुख साधन क सामान
ओ स्वयं ल क अओतीह
बेटी अहींक सुख पओतिह
हमर की
हमर ते किस्मत जेहन अछ ओहने
रही जायत.......................................