मोतीदाइ - मिथिला दैनिक

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शनिवार, 7 नवंबर 2009

मोतीदाइ


गाम उजैनी। गहिल माताक भगतिन मोतीदाइ। मोतीदाइ जाितक रजक। एक िदनक गप, बाड़ीमे

गोबर पािथ रहल छलीह मोतीदाइ। गुअरटोलीक जनानी सभ हुनका देिख कऽ बाजल।

-अपन माल-जाल भगाऊ नहि तँ सभटा माल-जाल बिसखि जाएत, बाँझ भऽ जाएत; जेना ई मोतीदाइ अछि।

मोतीदाइ दुखसँ भरि गेलीह। गहिल माताक गहमर गेलीह, पीड़ी खोदऽ लगलीह। गहिल माता प्रगट

भेलीह।

-ठीक छै। हम इन्द्रक दरबार जएब आ अहाँ लेल बच्चा माँगब।

इन्द्रक दरबार। गहिल माता अपन भगतिन लेल बच्चा मँगलन्हि।

इन्द्र िहसाब लगेलन्हि।

-पूर्व जन्मक फल छै। ओकरा बच्चा नहि िलखल छै।

गहिल माता घुरलीह। मोतीदाइकेँ ई सभ कहलन्हि।

-आह! तखन हमर जीवन िनरथर्क अछि। एहिसँ तँ मरबे नीक।

मरबाक सूरसार शुरू केलन्हि मोतीदाइ।

गहिल माता फेर इन्द्र लग गेलीह। सभटा गप कहलन्हि।

-ठीक छै। बच्चा तँ होएतन्हि मोतीदाइकेँ मुदा छठिहारी िदन ओ मरि जएतन्हि।

सैह भेल। छठिहारी िदन बच्चा मरि गेल। बाँझ होएबाक दुख मुदा खतम भेलन्हि। गहिल माताक

भगता ओ खेलाए लगलीह।