दीना-भदरी - मिथिला दैनिक

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मंगलवार, 3 नवंबर 2009

दीना-भदरी


नेपालक मिथिलांचलमे अछि जोगियानगर जतए रहै छला दु भाइ- दीना आ भदरी। मुसहर जातिक रहथि आ खेती करैत छलाह।

पाँच-पाँच मोनक कोदारि छलन्हि आ बिगहा भरि जमीन तामि लै छलाह दिन भरिमे।

जोगियानगरक बगलमे जाँजर गाम छल। ओतुक्का जमीन्दार छल कनक सिंह आ ओकर पत्नी रहए बुधनी। बड़ बदमाश दुनू टा। बोनिहार केँ देखए नहि चाहैत छल।

कनक सिंहकेँ पता चललै जे दीना-भदरी लग पाँच-पाँच मोनक कोदारि छै आ ओ सभ बिगहा-बिगहा भरि जमीन तामि लै छथि दिन भरिमे। ओ जोगियानगर गेल आ दीना-भदरीकेँ अपन गाम बजेलकै खेतीक करबा लेल। दीना-भदरीकेँ कनक सिंहक बोनिहारपर कएल जा रहल अत्याचार बुझल रहै। मारि-मारि कऽ छूटलाह ओ दुनू गोटे कनक सिंहपर। भागल कनक सिंह।

बुधनीकेँ पता चललै। ओ सलहेस थान गेल। कठोर तपस्या केलक। सलहेस प्रकट भेलाह। -माँग की चाही!
-दीना-भदरीक प्राण।
-आह।
सलहेस मूर्छित भऽ गेलाह। मुदा वचनक हारल। की करताह?
रातिमे दीना-भदरीकेँ सपना देलन्हि सलहेस।
-कटैया बोन मे आऊ। बड्ड शिकार भेटत।

रातिएमे बिदा भेलाह दीना-भदरी, तीर-धनुष लेने। संगमे मामा बहुरन। रस्तामे नंगड़ागोड़िया गाम, ओतए रहैत छलाह हुनकर सभक दोस जीतन यादव। हुनको शिकारक लेल चलबाक लेल कहलन्हि।
अमावस्याक राति! अन्हार गुज्ज।
मुदा शिकार एक्को टा नहि। बादुर घुमैत। दीना एसगरे जंगलक बीचमे चलि गेलाह। ओतए ठाढ़ि छलि बुधनी, सलहेस सेहो संगमे छलाह।
बुधनी बाजल:
-बोनक जानवरक देवता सलहेस अपन खुनीमा बाघ बजाऊ।

दीना बाण चलेलन्हि मुदा बाण रस्ता बिसरि जाइत छल। मल्ल युद्ध भेल। दीना सलहेसक नाम लए आक्रमण कएलन्हि, बाघकेँ मारि देलन्हि।

बुधनी बजल- भेष बदलैबाली अपघात भेलि बाघिनकेँ बजाऊ।

सलहेस दीनाक वीरतासँ प्रसन्न छलाह मुदा करथि तँ करथि की?

बगराक भेष बना कए बाघिन आयलि आ दीनाकेँ अपन बिखाह चांगुरसँ मारि देलक।

तखने भदरीक मोन बिखिन्न सन भेलैक।
-बहुरन मामा। हम जा रहल छी भैया लग। अहाँ गाछपर बैसि कऽ प्रतीक्षा करू।
लहास लग पहुँचलाह भदरी मुदा ओ बहुरुपिया बगरा हुनको मारि देलकन्हि।
बुधनी घर घुरि गेलि।

दीना आ भदरीक आत्मा दु गोटेक शरीरमे पैस गेल। बहुरन लग पहुँचलाह दुनू गोटे।
-अहाँक दुनू भागिन मारल गेलाह। गाम खबरि करू। लहास लऽ जाऊ। श्राद्ध करबाऊ। तावत जीतन सेहो पहुँचि गेलाह। जीतन गाम लऽ गेलाह दुनू गोटेक लहासकेँ आ स्वयं अग्नि देलन्हि दुनू गोटेकेँ।

दीना-भदरीक माए निरसो। श्राद्ध लेल पाइये नहि। की करतीह?

सपना देलन्हि दीना-भदरी।
-माए। घरमे तूर अछि। बनीमा लग लऽ जाऊ। ओकर बदलामे ओ जे देत ताहिसँ हमर श्राद्ध भए जएत।

बनीमा जोखलक तूरकेँ- हँसैत। एक दिस तूर आ दोसर दिस बताशा। मुदा ई की? भरि दोकानक समान तौला गेल मुदा तूरबला पलड़ा नहि उठल। दीना-भदरी बैसि गेल रहथि ओहिपर।
बनीमा हाथ जोड़ि कऽ ठाढ़ भए गेल, निरसो संग बोनिहार आ समान पठा देलक। जेवार देलन्हि निरसो। दीना-भदरी रूप बदलि बारिक बनलाह। सभकेँ पड़सिकऽ खुअओलन्हि।
तखने दीना असल रूपमे आबि गेलाह। हुनकर कनियाँ हंसा हुनका देखि लेलन्हि। निरसो केँ ओ ई गप कहलन्हि- मुदा ओ गप नहि मानलन्हि।
-अपन छाती सात तह कपड़ासँ बान्हि लिअ आ ओकरा लग चलू जे दीना बनि गेल छल।

निरसो ओतए गेलीह। दूध निकलि कऽ दीना-भदरीक मुँहमे चलि गेल आ ओ दुनू गोटे बिला गेलाह।
फेर दीना-भदरी बिदा भेलाह मोरंग। जोरावरसिंह केँ मारि मुसहरक उत्थान कएलन्हि। फेर ताहिरकेँ मारलन्हि। फेर सुनरियाकेँ मारलन्हि। फेर धारक कातमे मारलन्हि डैनियाही बुधनीकेँ। डेढ़ सए दुष्टक नाश केलन्हि दीना-भदरी।
सलहेस बजलाह:
-जतए-जतए हमर पूजा हएत, ततए-ततए अहाँक पूजा सेहो हएत।
सलहेस आ दीना-भदरीक गहमर संगे रहए लागल तहियासँ।

फेर दीना-भदरीकेँ मुक्ति भेटि गेलन्हि। परलोकमे सलहेस आ दीना-भदरी संगे रहए लगलाह।